आर्मी डॉक्टर ने कठुआ के गाँव में जगाई उम्मीद की किरण, आठ वर्षीय अक्षय ने पाई अपनी खोई आवाज़

जम्मू और कश्मीर के कठुआ जिले के दुग्गन गाँव की शांत पहाड़ियों में रहने वाले आठ वर्षीय अक्षय शर्मा की जिंदगी में एक चमत्कार हुआ, जिसने न केवल उसके परिवार बल्कि पूरे गाँव को नई उम्मीद दी। अक्षय का जन्म कटे होंठ और तालू के साथ हुआ था। तीन साल की उम्र में उसकी सर्जरी तो हुई, लेकिन वह बोलने में असमर्थ रहा। वर्षों तक उसकी दुनिया खामोशी में डूबी रही।

अक्षय के पिता कुलवंत शर्मा सेना में असैन्य मजदूर हैं, जबकि माँ संतोष देवी गृहिणी हैं। परिवार आर्थिक तंगी से जूझते हुए भी अपने तीनों बच्चों को पढ़ाने में जुटा रहा। बड़े भाई सुशील और बहन काजल स्कूल जाते हैं, लेकिन अक्षय की खामोशी ने उसे सामाजिक और शैक्षणिक रूप से अलग-थलग कर दिया। शिक्षक उसकी बुद्धिमत्ता को पहचानते थे, परंतु वह बोल न पाने की वजह से समूह गतिविधियों से कट जाता था।

स्थानीय डॉक्टरों ने आश्वासन दिया था कि अक्षय समय के साथ बोलना सीख जाएगा, लेकिन साल-दर-साल इंतजार करने के बावजूद कोई प्रगति नहीं हुई। परिवार की उम्मीदें लगभग टूट चुकी थीं।

जून 2025 में मोड़ तब आया, जब कैप्टन सौरभ सालुंखे, 7 सिख लाइट इन्फैंट्री में रेजिमेंटल मेडिकल ऑफिसर के रूप में दुग्गन पहुँचे। पुणे के आर्मी मेडिकल कॉलेज से प्रशिक्षण प्राप्त युवा डॉक्टर ने चिकित्सा आउटरीच के दौरान अक्षय का मूल्यांकन किया और पाया कि उसकी खामोशी स्थायी नहीं है। स्पीच थेरेपी उसे बोलना सिखा सकती है।

गाँव में ऐसी कोई सुविधा न होने के कारण कैप्टन सालुंखे ने स्वयं स्पीच थेरेपी सीखने का निश्चय किया। अपनी सैन्य ड्यूटी पूरी करने के बाद वह रोज़ाना 2-3 घंटे अक्षय के साथ अभ्यास करने लगे। उन्होंने गले की मांसपेशियाँ मजबूत करने, जीभ और जबड़े की गतिशीलता बढ़ाने, ध्वनियों के उच्चारण और शब्द बनाने जैसे बुनियादी अभ्यासों से शुरुआत की। धीरे-धीरे अक्षय ने धैर्य और लगन के साथ इन अभ्यासों को अपनाया।

महीनों की मेहनत के बाद वह क्षण आया जब अक्षय ने पहली बार अपने माता-पिता को स्पष्ट आवाज़ में पुकारा। यह पल परिवार के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। माँ संतोष देवी खुशी से रो पड़ीं और पिता कुलवंत शर्मा की आँखें भी भर आईं। भाई-बहन सुशील और काजल तब भावुक हो उठे जब उनके छोटे भाई ने उन्हें “भैया” और “दीदी” कहकर बुलाया।

इसके बाद अक्षय ने तेज़ी से प्रगति की। अब वह कक्षा में प्रश्नों के उत्तर देता है, ज़ोर से पढ़ता है और समूह गतिविधियों में भाग लेता है। घर की दीवारें उसकी हँसी और बातों से गूँज उठी हैं। गाँव के लोग इस परिवर्तन को केवल एक बच्चे की चिकित्सा उपलब्धि नहीं मानते, बल्कि इसे आशा की कहानी मानते हैं।

दुग्गन के लोगों ने सेना को केवल सीमाओं का रक्षक नहीं, बल्कि जीवन का संरक्षक और मरहम लगाने वाला भी मानना शुरू कर दिया है। कैप्टन सालुंखे के लिए यह केवल एक चिकित्सीय सफलता नहीं, बल्कि उनके पेशे के उद्देश्य की सच्ची पुष्टि है — इंसानियत की सेवा।

अक्षय के माता-पिता के लिए बेटे की आवाज़ अमूल्य उपहार है। गाँव के लिए यह स्मरण है कि चमत्कार हमेशा अचानक नहीं होते, बल्कि करुणा, धैर्य और दृढ़ संकल्प से धीरे-धीरे बनते हैं। अक्षय के लिए अब उसका हर वाक्य जीत है — आत्मविश्वास और उज्ज्वल भविष्य की ध्वनि, जो एक सैनिक की करुणा से संभव हुई।

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