कबीरधाम में मिला इतिहास का अनमोल खजाना, 375 वर्ष पुरानी तालपत्र पांडुलिपि सहित 38 दुर्लभ दस्तावेज चिन्हित
कवर्धा, 13 जून: भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के तहत चल रहे ज्ञान भारतम् राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण के दौरान छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले में इतिहास और भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ी 38 दुर्लभ पांडुलिपियों एवं दस्तावेजों की पहचान की गई है। यह खोज जिले की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और प्राचीन बौद्धिक परंपराओं को नई पहचान देने वाली मानी जा रही है।
सर्वेक्षण के दौरान सबसे महत्वपूर्ण खोज लगभग 375 वर्ष पुरानी तालपत्र पर लिखित बंगाली भाषा की पाक-कला संबंधी पांडुलिपि रही। विशेषज्ञों के अनुसार यह दस्तावेज उस समय की जीवनशैली, खानपान संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान को समझने के लिए अत्यंत मूल्यवान है। तालपत्र पर संरक्षित इतने प्राचीन दस्तावेज आज बेहद दुर्लभ माने जाते हैं।
अभियान में वर्ष 1856 की संस्कृत भाषा में लिखित श्रीमद्भगवद्गीता और गजेंद्र मोक्ष से संबंधित पांडुलिपि भी प्राप्त हुई। इसके अलावा वर्ष 1839 की गीत गोविंद पांडुलिपि भारतीय भक्ति साहित्य और काव्य परंपरा की महत्वपूर्ण धरोहर के रूप में सामने आई है।
इतिहास के अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण रामनगर (मंडला) शिलालेख का हिंदी अनुवाद और वर्ष 1867 के भोरमदेव शिलालेख का अनुवाद भी सर्वेक्षण में चिन्हित किए गए हैं। वहीं संस्कृत में ब्रह्मांड के चित्रांकन से जुड़े दस्तावेज और जैमिनी परंपरा की पोथियां भारतीय दर्शन, ज्योतिष और खगोल विज्ञान की समृद्ध विरासत का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं।
ये महत्वपूर्ण दस्तावेज इतिहासकार एवं पुरातत्वविद आदित्य कुमार श्रीवास्तव के निजी संग्रह से प्राप्त हुए हैं। वहीं अजय कुमार चन्द्रवंशी के संग्रह से वर्ष 1898 का मड़वा महल शिलालेख का पद्यात्मक अनुवाद मिला है, जिसे मध्य भारत के इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत माना जा रहा है।
इसके अतिरिक्त ग्राम बसनी निवासी सुभाष पाण्डेय के संग्रह से धर्म और वैदिक परंपराओं से संबंधित कई दुर्लभ पांडुलिपियां प्राप्त हुई हैं। इनमें जलाशयाराम मठोत्सर्ग विधि, महामृत्युंजय स्तोत्र, संध्या विधि, त्रांत्रिक संध्या, श्राद्ध पद्धति, गुरुगीता, कीर्तिकात्सर्ग, कपिला सर्पण विधि, वनोत्सर्गादि विधि तथा श्री रघुनाथ चरण चिन्ह स्तोत्र जैसी महत्वपूर्ण रचनाएं शामिल हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन दस्तावेजों में धार्मिक अनुष्ठानों, वैदिक परंपराओं, आध्यात्मिक साधना और लोक जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां संरक्षित हैं, जो क्षेत्र की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को समझने में सहायक सिद्ध होंगी।
प्रशासन के अनुसार इन दुर्लभ धरोहरों का वर्षों से निजी स्तर पर संरक्षण किया जा रहा था। अब ज्ञान भारतम् अभियान के तहत इनका डिजिटलीकरण, दस्तावेजीकरण और वैज्ञानिक संरक्षण सुनिश्चित किया जाएगा, ताकि यह अमूल्य विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंच सके।
कलेक्टर गोपाल वर्मा ने जिले के नागरिकों से अपील की है कि यदि उनके पास प्राचीन पांडुलिपियां, हस्तलिखित ग्रंथ, शिलालेखों के अनुवाद, वंशावली दस्तावेज या अन्य ऐतिहासिक अभिलेख सुरक्षित हैं, तो उनकी जानकारी जिला प्रशासन को दें। उन्होंने कहा कि नागरिक ज्ञान भारतम् ऐप के माध्यम से भी इन धरोहरों का पंजीयन कर इस राष्ट्रीय अभियान का हिस्सा बन सकते हैं।
बाइट: आदित्य कुमार श्रीवास्तव, इतिहासकार एवं पुरातत्वविद, कबीरधाम।


