मतदाता सूची: आँकड़े बताते हैं पूरा सच

हाल ही में संपन्न हुए चुनावों की निर्वाचन प्रक्रिया पर कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा सवाल उठाए जा रहे हैं। विभिन्न गुट, राजनीतिक नौटंकी में उलझकर, महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2024 की मतदाता सूचियों पर आरोप लगा रहे हैं और अप्रमाणित तथ्यों व काल्पनिक कहानियों के आधार पर शंका पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन असली तस्वीर आँकड़े ही बताते हैं।


महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2024 में क्या हुआ?

लोकसभा चुनाव 2024 और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2024 के बीच मतदाताओं की संख्या में 40.80 लाख की बढ़ोतरी को “अभूतपूर्व” बताया जा रहा है। लेकिन रुझान कुछ और कहते हैं।

2024 में विधानसभा चुनावों में मतदाताओं की संख्या लोकसभा चुनावों की तुलना में 4.38% बढ़ी। 2019 में यह बढ़ोतरी 1.31% थी। 2014 में 3.38%, जबकि 2009 और 2004 में क्रमशः 4.13% और 4.69% की वृद्धि हुई थी।

2004 और 2009 में कांग्रेस ने महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव जीते थे। 2014 और 2024 में भाजपा-नीत गठबंधन जीता, जबकि 2019 में कई दलों के पोस्ट-पोल गठबंधन ने सत्ता बनाई।

यानी, 2024 में 4.38% की वृद्धि को अभूतपूर्व कहना गलत है, क्योंकि 2009 (4.13%) और 2004 (4.69%) में भी यही पैटर्न देखा गया था। मतदाताओं की संख्या में कुल बढ़ोतरी जनसंख्या के अनुपात में होती है। इसलिए केवल 40.80 लाख नए मतदाताओं की बढ़ोतरी को गड़बड़ी का सबूत नहीं माना जा सकता।


क्या कटऑफ समय के बाद बड़े पैमाने पर मतदाता जोड़े जा सकते हैं?

क्या आप जानते हैं कि 2024 लोकसभा चुनाव में एक बूथ पर मतदाताओं की संख्या 1,500 तक सीमित की गई थी? यह इसलिए ताकि लंबी कतारें न लगें और हर कोई समय पर वोट डाल सके।

महाराष्ट्र में प्रति बूथ औसतन 968 मतदाता और 640 वोटर थे। एकीकृत प्रारूप मतदाता सूची (चुनाव से पहले) से लेकर नामांकन की अंतिम तिथि तक, बूथ-स्तरीय अभिकर्ताओं और राजनीतिक दलों के पास तीन महीने से अधिक का समय था कि वे किसी भी विसंगति को दर्ज करें।

अब सवाल उठता है – क्या मतदान के अंतिम घंटे में बड़ी संख्या में मतदाता जोड़े जा सकते हैं? बिल्कुल नहीं। बूथ-स्तरीय अभिकर्ताओं की मौजूदगी में छोटी-सी बढ़ोतरी भी छिप नहीं सकती। यही कारण है कि प्रक्रिया खुद अपनी विश्वसनीयता साबित करती है।

इसलिए जब गुट दावा करते हैं कि अंतिम घंटे में मतदाता जोड़कर नतीजों से छेड़छाड़ हुई है, तो यह दावा गलत है। बल्कि यह आरोप उन्हीं दलों के बूथ-स्तरीय अभिकर्ताओं पर सवाल खड़ा करता है।


क्या किसी बूथ से हजारों मतदाता हटाए जा सकते हैं?

पूरी निर्वाचन प्रक्रिया कई सूक्ष्म चरणों से मिलकर बनी है और हर चरण पिछले चरण की पुष्टि करता है। अगर प्रारूप मतदाता सूची में कोई समस्या है, तो फार्म 6, 7 और 8 के जरिए नाम जोड़ने-घटाने की प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि अंतिम सूची सही हो।

मतदाता सूचियाँ बूथ स्तर तक उपलब्ध रहती हैं, जिससे राजनीतिक दलों के पास उन्हें गहराई से जाँचने का पर्याप्त समय होता है। विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SSR) हर साल होता है, यहाँ तक कि गैर-चुनाव वर्ष में भी, जिससे दल किसी भी विसंगति को पकड़ सकें।

चूंकि एक राष्ट्रीय चुनाव में प्रति बूथ अधिकतम 1,500 मतदाता ही होते हैं (और राज्य चुनाव में यह संख्या इससे भी कम रहती है), इसलिए किसी बूथ पर बड़े पैमाने पर गड़बड़ी छिपाना असंभव है।

दिलचस्प बात यह है कि कर्नाटक पर अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल गांधी ने खुद ही अपने पहले बयान का खंडन कर दिया। अगर बड़े पैमाने पर मतदाता हटाना संभव नहीं है, तो बड़े पैमाने पर मतदाता जोड़ना भी संभव नहीं है।

निर्वाचन की प्रक्रियाएँ बेहद मज़बूत हैं और हर चरण में कई हितधारक शामिल होते हैं। इसलिए किसी को भी इतनी आसानी से धोखा देना संभव नहीं है।

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